हितों का टकराव: लोकतंत्र की अनदेखी होती नैतिक चुनौती


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"न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ भी दिखना चाहिए।" यही सिद्धांत लोकतंत्र की हर संस्था पर लागू होता है। लेकिन क्या आज भारत के सार्वजनिक जीवन में यह कसौटी कमजोर पड़ती जा रही है?

लोकतंत्र में Conflict of Interest यानी हितों का टकराव कोई तकनीकी शब्द नहीं, बल्कि सुशासन की बुनियादी शर्त है। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई व्यक्ति दोषी है, बल्कि यह कि ऐसी स्थिति पैदा हो जाए जहां किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के निजी, राजनीतिक या संस्थागत हित उसके निर्णय को प्रभावित कर सकते हों, या कम से कम ऐसा प्रतीत होता हो। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कई बार दिखने वाला पक्षपात भी वास्तविक पक्षपात जितना ही नुकसानदेह होता है, क्योंकि संस्थाओं पर जनता का भरोसा इसी धारणा पर टिका होता है कि निर्णय निष्पक्ष हैं।

एक समय था जब सार्वजनिक जीवन में नैतिक जवाबदेही की अपनी एक परंपरा थी। 1956 में अरियालुर रेल दुर्घटना के बाद तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया, जबकि दुर्घटना के लिए उनकी व्यक्तिगत भूमिका सिद्ध नहीं हुई थी। 1958 में टी. टी. कृष्णमाचारी ने मुंद्रा कांड के बाद वित्त मंत्री पद छोड़ा। बाद के वर्षों में ए. राजा ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले की जांच के दौरान इस्तीफा दिया और अशोक चव्हाण ने आदर्श हाउसिंग विवाद के बीच मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। इन मामलों में दोष सिद्ध होना अलग प्रश्न था, लेकिन सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने के लिए पद छोड़ना एक नैतिक परंपरा का हिस्सा माना गया।

आज तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।

हाल के दिनों में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव से जुड़े भूमि आवंटन को लेकर उठे सवालों ने हितों के टकराव पर बहस को फिर जीवित किया। इंडियन एक्सप्रेस के जय मजूमदार की इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार एवं उनके परिवार की स्वामित्व वाली कंपनियों ने धार्मिक नगरी उज्जैन में उज्जैन मास्टर प्लान 2035 के जारी होने से पहले 253 एकड़ जमीन उनके मंत्री बनने के बाद से खरीदी है. इस पूरी रिपोर्ट से मुख्यमंत्री के शपथ और उनके हितों का टकराव साफ दिखता है. मोहन यादव 2010 से ही ऐसे पदों पर हैं जहां उनके पास सरकार से जुड़ी आधिकारिक योजनाओं से संबंधित कागजात मौजूद रहने के पूरे सक्ष्य हैं. इसके बावजूद भी उनके बचाव में दिया जा रहा तर्क बहुत ही आधारहीन है कि उनके परिवार को इस बात की जानकारी नहीं थी. 

इसी तरह केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी के परिवार को खरे की खेती के लिए मिले 99 करोड़ रुपए की सब्सिडी भी कुछ इसी तरीके के सवालों के घेरे में है. क्या किसी केंद्रीय राज्य मंत्री के परिवार को उन्हीं के मातहत आने वाला हॉर्टिकल्चर बोर्ड खीरे की खेती के लिए सब्सिडी दे सकता है. क्या यह हितों का टकराव नहीं की एक केंद्रीय राज्य मंत्री के परिवार को उनके ही मंत्रालय के अधिकारी खरे की खेती के लिए सब्सिडी दे रहे हैं? 


इन मामलों में जांच और राजनीतिक जवाबदेही अपनी जगह है, लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या ऐसी परिस्थितियों में पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच के लिए पर्याप्त संस्थागत दूरी बनाई जाती है?

यही सवाल पत्रकारिता पर भी लागू होता है। हाल ही में News18 के पत्रकार यतेन्द्र शर्मा की उत्तर प्रदेश भाजपा में प्रदेश सचिव के रूप में नियुक्ति ने मीडिया और राजनीति के रिश्ते पर नई बहस छेड़ दी। किसी भी पत्रकार को राजनीति में आने का पूरा अधिकार है, लेकिन जब सक्रिय पत्रकारिता और सक्रिय राजनीतिक दायित्व के बीच स्पष्ट दूरी न दिखे, तो पत्रकारिता की निष्पक्षता पर स्वाभाविक प्रश्न उठते हैं। यतेंद्र के उत्तर प्रदेश भाजपा के मंत्री के रूप में नियुक्ति के दिन तक वह न्यूज़ 18 में बतौर रिपोर्टर कम कर रहे थे. तो क्या यह सवाल वाजिब नहीं की उन्होंने दो ऐसे काम एक साथ एक समय पर कैसे किया जिसका साथ में होना स्वाभाविक ही नहीं है. यह क्यों न माना जाए कि आपने पत्रकार के तौर पर अपनी जिम्मेदारियां सही से ना निर्वहन करते हुए एक राजनीतिक दल के लिए काम किया जिसके इनाम स्वरूप आपको भाजपा के उत्तर प्रदेश इकाई में मंत्री के रूप में नियुक्त किया जाता है. 



लोकतंत्र में प्रेस केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला संस्थागत स्तंभ भी है। ऐसे गभीर उदाहरण से यह साफ झलकता है कि कैसे प्रेस के लोग अपने कर्तव्यों से (सत्ता से जवाबदेही सुनिश्चित करना है) भटककर सत्ता में मौजूद राजनीतिक दल के कार्यकर्ता या उससे जुड़े पक्षकार के रूप में काम कर रहे हैं. 

अयोध्या में राम मंदिर दान से जुड़े विवाद की जांच कर रही एसआईटी की रिपोर्ट उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद को सौंपी गई। चूंकि वे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य भी हैं, इस प्रक्रिया को लेकर सार्वजनिक विमर्श में हितों के टकराव का प्रश्न उठा। क्या कोई जाँच एजेंसी अपनी जांच की रिपोर्ट उसे व्यक्ति को सौंप सकती है जिस व्यक्ति के खिलाफ जांच की जा रही हो. इस मामले में संजय प्रसाद की जांच तो नहीं हो रही थी लेकिन संजय प्रसाद राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य हैं जिसके कई सदस्यों के ऊपर दान के गबन में शामिल होने का आरोप है. मुख्यमंत्री द्वारा गठित एक SIT पहले तो उसे ट्रस्ट की जान और उससे जुड़े लोगों की जांच करती है और फिर उसकी प्राथमिक रिपोर्ट उसे व्यक्ति को ही सौंपती है जो उसे ट्रस्ट का सदस्य है.
इस पूरे मामले में न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है जब गुनहगार ही जज की भूमिका का भी निर्वहन कर रहा है. ये पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुरूप रही हो या नहीं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि निर्णय और जांच निष्पक्ष दिखाई दें।


यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। पहले जहां संभावित हितों के टकराव की स्थिति में स्वयं को निर्णय प्रक्रिया से अलग कर लेना या पद छोड़ देना नैतिक आचरण माना जाता था, वहीं आज कई बार ऐसी परिस्थितियों को सामान्य राजनीतिक विवाद मानकर आगे बढ़ जाया जाता है। इससे कानूनी प्रक्रिया भले प्रभावित न हो, लेकिन संस्थाओं की विश्वसनीयता अवश्य प्रभावित होती है।

भारत में न्यायपालिका में कई अवसरों पर न्यायाधीशों ने संभावित हितों के टकराव की स्थिति में स्वयं को मामलों की सुनवाई से अलग किया है। दुनिया के अनेक लोकतंत्रों में मंत्री, सांसद, वरिष्ठ अधिकारी और नियामक संस्थाओं के सदस्य अपने निजी हितों की घोषणा करते हैं और संबंधित मामलों में recusal यानी स्वयं को निर्णय प्रक्रिया से अलग कर लेते हैं। भारत में भी इस संस्कृति को व्यापक रूप से विकसित करने की आवश्यकता है।

सवाल केवल इन कुछ मामलों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत को सार्वजनिक जीवन के लिए एक स्पष्ट Conflict of Interest Code की जरूरत है? क्या मंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों, संवैधानिक पदाधिकारियों और सार्वजनिक संस्थानों के लिए निजी हितों की अनिवार्य घोषणा, स्वतंत्र एथिक्स कमेटी और recusal जैसी व्यवस्थाएं विकसित नहीं की जानी चाहिए?

लोकतंत्र केवल कानूनों से नहीं चलता, बल्कि नैतिक मानकों से भी संचालित होता है। किसी व्यक्ति के निर्दोष या दोषी होने का फैसला अदालत करती है, लेकिन संस्थाओं पर जनता का भरोसा इस बात से तय होता है कि वे संभावित हितों के टकराव की स्थिति में कितना पारदर्शी और जवाबदेह व्यवहार करती हैं।

आखिरकार, लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि हितों का टकराव साबित हुआ या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या जनता को यह भरोसा है कि निर्णय लेने वाला व्यक्ति पूरी तरह निष्पक्ष था? यदि इस प्रश्न का उत्तर कमजोर पड़ने लगे, तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी, जनविश्वास - धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है। 

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