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हितों का टकराव: लोकतंत्र की अनदेखी होती नैतिक चुनौती

                                                        Image Credit : Chatgpt  "न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ भी दिखना चाहिए।" यही सिद्धांत लोकतंत्र की हर संस्था पर लागू होता है। लेकिन क्या आज भारत के सार्वजनिक जीवन में यह कसौटी कमजोर पड़ती जा रही है? लोकतंत्र में Conflict of Interest यानी हितों का टकराव कोई तकनीकी शब्द नहीं, बल्कि सुशासन की बुनियादी शर्त है। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई व्यक्ति दोषी है, बल्कि यह कि ऐसी स्थिति पैदा हो जाए जहां किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के निजी, राजनीतिक या संस्थागत हित उसके निर्णय को प्रभावित कर सकते हों, या कम से कम ऐसा प्रतीत होता हो। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कई बार दिखने वाला पक्षपात भी वास्तविक पक्षपात जितना ही नुकसानदेह होता है, क्योंकि संस्थाओं पर जनता का भरोसा इसी धारणा पर टिका होता है कि निर्णय निष्पक्ष हैं। एक समय था जब सार्वजनिक जीवन में नैतिक जवाबदेही की अपनी एक परंपरा थी। 1956 में...

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