बसंत पंचमी: प्रकृति, प्रज्ञा और वैश्विक चेतना का पावन पर्व
ऋग्वेद के पन्नों में बसंत पंचमी की जड़ें अत्यंत गहरी हैं। वहाँ के ऋषियों ने सरस्वती को मात्र एक विग्रह नहीं माना, बल्कि उन्हें 'नदीतमे, देवितमे, अम्बितमे' कहकर संबोधित किया—जिसका अर्थ है वह चेतना जो श्रेष्ठ नदी भी है, श्रेष्ठ देवी भी और एक करुणामयी माता भी। माघ शुक्ल पंचमी केवल पंचांग की एक तिथि नहीं है, बल्कि यह वह क्षण है जब भारतीय चेतना प्रकृति के साथ पुनः संवाद स्थापित करती है। यह पर्व जड़ता से सृजन और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का उत्सव है। बसंत पंचमी हमें स्मरण कराती है कि 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' केवल एक वैदिक मंत्र नहीं, अपितु जीवन जीने का एक मार्ग है। यह पर्व ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की उपासना और प्रकृति के नव-श्रृंगार का एक अनुपम संगम है। जब वर्तमान संसार भौतिक उपलब्धियों की अंधी दौड़ में संवेदनशीलता और विवेक खोता जा रहा है, तब बसंत पंचमी का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है कि जीवन का वास्तविक सौंदर्य ज्ञान, विनम्रता और संतुलन में ही निहित है। इस पर्व की जड़ें हमारे प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद तक जाती हैं। ऋग्वैदिक ऋषियों ने सरस्वती को मात्र एक द...



