पहचान की फाइल: जब अस्तित्व को सरकारी मुहर का इंतज़ार हो
भारत में कानून अक्सर बदलाव का माध्यम बनते हैं, लेकिन कभी-कभी वही कानून समाज को पीछे भी धकेल देते हैं। ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन अधिनियम, 2026 ऐसा ही एक उदाहरण बनता जा रहा है। यह कानून जिस समुदाय के अधिकारों की रक्षा का दावा करता है, वही समुदाय आज इसके खिलाफ सड़कों पर है। 2014 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक NALSA v. Union of India judgment फैसले ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को आत्म-पहचान का अधिकार दिया था। यह फैसला सिर्फ एक कानूनी जीत नहीं, बल्कि गरिमा और अस्तित्व की मान्यता था। लेकिन 2026 का संशोधन इस मूल भावना को बदल देता है। अब किसी व्यक्ति की पहचान उसके अपने शब्दों से नहीं, बल्कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट से तय होगी। यह बदलाव एक गहरे संकट की ओर इशारा करता है। पहचान, जो अब तक व्यक्तिगत अनुभव और आत्म-बोध का विषय थी, उसे अब एक प्रशासनिक प्रक्रिया में बदल दिया गया है। यानी “मैं कौन हूँ” का जवाब अब व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सर्टिफिकेट देगा। यह सोच न केवल असंवेदनशील है, बल्कि खतरनाक भी है, क्योंकि यह राज्य को व्यक्ति की निजी पहचान पर अधिकार दे देती है। इस कानून की एक ...



